जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जाती
तो हम सियाह-नसीबों की ईद हो जाती
अनवर शऊर
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जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जाती
तो हम सियाह-नसीबों की ईद हो जाती
अनवर शऊर
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कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए
दिगर-गूँ हैं मिरे हालात जब से तुम नहीं आए
अनवर शऊर
कभी रोता था उस को याद कर के
अब अक्सर बे-सबब रोने लगा हूँ
अनवर शऊर
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कह तो सकता हूँ मगर मजबूर कर सकता नहीं
इख़्तियार अपनी जगह है बेबसी अपनी जगह
अनवर शऊर
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कहाँ है शैख़ को सुध-बुध मज़ीद पीने की
नशा उतार गए तीन चार जाम उस का
अनवर शऊर
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किस क़दर बद-नामियाँ हैं मेरे साथ
क्या बताऊँ किस क़दर तन्हा हूँ मैं
अनवर शऊर

