मिरी हयात है बस रात के अँधेरे तक
मुझे हवा से बचाए रखो सवेरे तक
अनवर शऊर
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मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में
रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
अनवर शऊर
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मुस्कुरा कर देख लेते हो मुझे
इस तरह क्या हक़ अदा हो जाएगा
अनवर शऊर
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मुस्कुराए बग़ैर भी वो होंट
नज़र आते हैं मुस्कुराए हुए
अनवर शऊर
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निज़ाम-ए-ज़र में किसी और काम का क्या हो
बस आदमी है कमाने का और खाने का
अनवर शऊर
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सामने आ कर वो क्या रहने लगा
घर का दरवाज़ा खुला रहने लगा
अनवर शऊर
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सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं
न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर
अनवर शऊर
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