शायद नियाज़-मंद को हासिल नियाज़ हो
हसरत से तक रहा हूँ तिरी रहगुज़र को मैं
अनवर सहारनपुरी
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वो ताज़ा दास्ताँ हूँ मरने के बा'द उन को
आएगा याद मेरा अफ़्साना ज़िंदगी का
अनवर सहारनपुरी
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आदमी बन के मिरा आदमियों में रहना
एक अलग वज़्अ है दरवेशी ओ सुल्तानी से
अनवर शऊर
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आदमी के लिए रोना है बड़ी बात 'शुऊर'
हँस तो सकते हैं सब इंसान हँसी में क्या है
अनवर शऊर
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अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ
अनवर शऊर
अच्छों को तो सब ही चाहते हैं
है कोई कि मैं बहुत बुरा हूँ
अनवर शऊर
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बहरूप नहीं भरा है मैं ने
जैसा भी हूँ सामने खड़ा हूँ
अनवर शऊर
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