तुझ से मिलने को बे-क़रार था दिल
तुझ से मिल कर भी बे-क़रार रहा
रसा चुग़ताई
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तुझ से मिलने को बे-क़रार था दिल
तुझ से मिल कर भी बे-क़रार रहा
रसा चुग़ताई
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उन झील सी गहरी आँखों में
इक लहर सी हर दम रहती है
रसा चुग़ताई
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उस से कहना कि कभी आ के मिले
हम से रंजिश का सबब जो भी हो
रसा चुग़ताई
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उस से कहना कि कभी आ के मिले
हम से रंजिश का सबब जो भी हो
रसा चुग़ताई
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उठ रहा है धुआँ मिरे घर में
आग दीवार से उधर की है
रसा चुग़ताई
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उठा लाया हूँ सारे ख़्वाब अपने
तिरी यादों के बोसीदा मकाँ से
रसा चुग़ताई

