उठा लाया हूँ सारे ख़्वाब अपने
तिरी यादों के बोसीदा मकाँ से
रसा चुग़ताई
आए अगर क़यामत तो धज्जियाँ उड़ा दें
फिरते हैं जुस्तुजू में फ़ित्ने तिरी गली के
रसा रामपुरी
बअ'द-ए-फ़ना भी ख़ैर से तन्हा नहीं हैं हम
बंदों से छुट गए तो फ़रिश्तों में आ मिले
रसा रामपुरी
बअ'द-ए-फ़ना भी ख़ैर से तन्हा नहीं हैं हम
बंदों से छुट गए तो फ़रिश्तों में आ मिले
रसा रामपुरी
बड़ी ही धूम से दावत हो फिर तो ज़ाहिद की
ये मय जो चार घड़ी को हलाल हो जाए
रसा रामपुरी
वो ख़ुश किसी के साथ हैं ना-ख़ुश किसी के साथ
हर आदमी की बात है हर आदमी के साथ
रसा रामपुरी
घर भी है घर में सभी अपने भी हैं
हाँ मोहब्बत की मगर ख़्वाहिश न कर
रशीद अफ़रोज़

