घर में जी लगता नहीं और शहर के
रास्ते लगते नहीं अपने अज़ीज़
रसा चुग़ताई
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हाल-ए-दिल पूछते हो क्या तुम ने
होते देखा है दिल उदास कहीं
रसा चुग़ताई
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है कोई यहाँ शहर में ऐसा कि जिसे मैं
अपना न कहूँ और वो अपना मुझे समझे
रसा चुग़ताई
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है कोई यहाँ शहर में ऐसा कि जिसे मैं
अपना न कहूँ और वो अपना मुझे समझे
रसा चुग़ताई
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हम किसी को गवाह क्या करते
इस खुले आसमान के आगे
रसा चुग़ताई
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हुईं आँखें अजब बेहाल अब के
ये बारिश कर गई कंगाल अब के
रसा चुग़ताई
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इस घर की सारी दीवारें शीशे की हैं
लेकिन इस घर का मालिक ख़ुद इक पत्थर है
रसा चुग़ताई
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