घर भी है घर में सभी अपने भी हैं
हाँ मोहब्बत की मगर ख़्वाहिश न कर
रशीद अफ़रोज़
वक़्त के क़द्र-दाँ की नज़रों में
ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती
रशीद कौसर फ़ारूक़ी
ऐ गुल-अंदाम ये है फस्ल-ए-जवानी का उरूज
हुस्न का रंग टपकने को है रुख़्सारों से
रशीद लखनवी
ऐ गुल-अंदाम ये है फस्ल-ए-जवानी का उरूज
हुस्न का रंग टपकने को है रुख़्सारों से
रशीद लखनवी
अपनी वहशत से है शिकवा दूसरे से क्या गिला
हम से जब बैठा न जाए कू-ए-जानाँ क्या करे
रशीद लखनवी
बुतों के दिल में हमारी कुछ अब हुई है जगह
ख़ुदा ने रहम किया वर्ना मर गए होते
रशीद लखनवी
देखिए लाज़िम-ओ-मलज़ूम इसे कहते हैं
दिल है दाग़ों के लिए दाग़ मिरे दल के लिए
रशीद लखनवी

