मुँह-ज़बानी क़ुरआन पढ़ते थे
पहले बच्चे भी कितने बूढ़े थे
मोहम्मद अल्वी
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मुतमइन है वो बना कर दुनिया
कौन होता हूँ मैं ढाने वाला
मोहम्मद अल्वी
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नहा कर भीगे बालों को सुखाती
छतों पर लड़कियाँ अच्छी लगी हैं
मोहम्मद अल्वी
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नया साल दीवार पर टाँग दे
पुराने बरस का कैलेंडर गिरा
मोहम्मद अल्वी
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नज़रों से नापता है समुंदर की वुसअतें
साहिल पे इक शख़्स अकेला खड़ा हुआ
मोहम्मद अल्वी
ऑफ़िस में भी घर को खुला पाता हूँ मैं
टेबल पर सर रख कर सो जाता हूँ मैं
मोहम्मद अल्वी
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पहली बूँद गिरी टिप से
फिर सब कुछ पानी में था
मोहम्मद अल्वी
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