काँटे की तरह सूख के रह जाओगे 'अल्वी'
छोड़ो ये ग़ज़ल-गोई ये बीमारी बुरी है
मोहम्मद अल्वी
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कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं
निकल के घर से न फिर अपने घर में आऊँ मैं
मोहम्मद अल्वी
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कहाँ भटकते फिरोगे 'अल्वी'
सड़क से पूछो किधर गई है
मोहम्मद अल्वी
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कहीं खो न जाए क़यामत का दिन
ये अच्छा समय है अभी भेज दे
मोहम्मद अल्वी
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खिड़कियों से झाँकती है रौशनी
बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में
मोहम्मद अल्वी
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किसी से कोई तअल्लुक़ रहा न हो जैसे
कुछ इस तरह से गुज़रते हुए ज़माने थे
मोहम्मद अल्वी
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कितना मुश्किल है ज़िंदगी करना
और न सोचो तो कितना आसाँ है
मोहम्मद अल्वी
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