रोज़ कहता है हवा का झोंका
आ तुझे दूर उड़ा ले जाऊँ
मोहम्मद अल्वी
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सामने दीवार पर कुछ दाग़ थे
ग़ौर से देखा तो चेहरे हो गए
मोहम्मद अल्वी
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सब नमाज़ें बाँध कर ले जाऊँगा मैं अपने साथ
और मस्जिद के लिए गूँगी अज़ाँ रख जाऊँगा
मोहम्मद अल्वी
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सदियों से किनारे पे खड़ा सूख रहा है
इस शहर को दरिया में गिरा देना चाहिए
मोहम्मद अल्वी
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सर्दी में दिन सर्द मिला
हर मौसम बेदर्द मिला
मोहम्मद अल्वी
शांति की दुकानें खोली हैं
फ़ाख़ताएँ कहाँ की भोली हैं
मोहम्मद अल्वी
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शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ
मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख लेता हूँ
मोहम्मद अल्वी
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