दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई
मीर तक़ी मीर
दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का
मीर तक़ी मीर
दूर बैठा ग़ुबार-ए-'मीर' उस से
इश्क़ बिन ये अदब नहीं आता
मीर तक़ी मीर
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फ़ुर्सत में इक नफ़स के क्या दर्द-ए-दिल सुनोगे
आए तो तुम व-लेकिन वक़्त-ए-अख़ीर आए
मीर तक़ी मीर
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ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत ग़म रहा
मीर तक़ी मीर
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गुफ़्तुगू रेख़्ते में हम से न कर
ये हमारी ज़बान है प्यारे
मीर तक़ी मीर
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गूँध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है
रंग बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में
मीर तक़ी मीर

