हज़ार मर्तबा बेहतर है बादशाही से
अगर नसीब तिरे कूचे की गदाई हो
मीर तक़ी मीर
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होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या काम मोहब्बत से उस आराम-तलब को
मीर तक़ी मीर
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होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता
मीर तक़ी मीर
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इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा
इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मसजूद जानते हैं
मीर तक़ी मीर
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इक़रार में कहाँ है इंकार की सी सूरत
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर
मीर तक़ी मीर
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इश्क़ है इश्क़ करने वालों को
कैसा कैसा बहम क्या है इश्क़
मीर तक़ी मीर
इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ
मीर तक़ी मीर
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