चाह का दावा सब करते हैं मानें क्यूँकर बे-आसार
अश्क की सुर्ख़ी मुँह की ज़र्दी इश्क़ की कुछ तो अलामत हो
मीर तक़ी मीर
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चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया
मीर तक़ी मीर
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चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच
मीर तक़ी मीर
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दावा किया था गुल ने तिरे रुख़ से बाग़ में
सैली लगी सबा की तो मुँह लाल हो गया
मीर तक़ी मीर
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दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इस में क्या इख़्तियार है अपना
मीर तक़ी मीर
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दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है
मीर तक़ी मीर
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दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है
मीर तक़ी मीर
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