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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

चाह का दावा सब करते हैं मानें क्यूँकर बे-आसार
अश्क की सुर्ख़ी मुँह की ज़र्दी इश्क़ की कुछ तो अलामत हो

मीर तक़ी मीर




चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया

मीर तक़ी मीर




चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच

मीर तक़ी मीर




दावा किया था गुल ने तिरे रुख़ से बाग़ में
सैली लगी सबा की तो मुँह लाल हो गया

मीर तक़ी मीर




दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इस में क्या इख़्तियार है अपना

मीर तक़ी मीर




दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है

मीर तक़ी मीर




दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है

मीर तक़ी मीर