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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

गर मिरे दिल को चुराया नहीं तू ने ज़ालिम
खोल दे बंद हथेली को दिखा हाथों को

मह लक़ा चंदा




गरचे गुल की सेज हो तिस पर भी उड़ जाती है नींद
सर रखूँ क़दमों पे जब तेरे मुझे आती है नींद

मह लक़ा चंदा




गुल के होने की तवक़्क़ो पे जिए बैठी है
हर कली जान को मुट्ठी में लिए बैठी है

मह लक़ा चंदा




हम जो शब को ना-गहाँ उस शोख़ के पाले पड़े
दिल तो जाता ही रहा अब जान के लाले पड़े

मह लक़ा चंदा




कभी सय्याद का खटका है कभी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ
बुलबुल अब जान हथेली पे लिए बैठी है

मह लक़ा चंदा




नादाँ से एक उम्र रहा मुझ को रब्त-ए-इश्क़
दाना से अब पड़ा है सरोकार देखना

मह लक़ा चंदा




संग-ए-रह हूँ एक ठोकर के लिए
तिस पे वो दामन सँभाल आता है आज

मह लक़ा चंदा