देखो दुनिया है दिल है
अपनी अपनी मंज़िल है
महबूब ख़िज़ां
देखते हैं बे-नियाज़ाना गुज़र सकते नहीं
कितने जीते इस लिए होंगे कि मर सकते नहीं
महबूब ख़िज़ां
एक मोहब्बत काफ़ी है
बाक़ी उम्र इज़ाफ़ी है
महबूब ख़िज़ां
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घबरा न सितम से न करम से न अदा से
हर मोड़ यहाँ राह दिखाने के लिए है
महबूब ख़िज़ां
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हाए फिर फ़स्ल-ए-बहार आई 'ख़िज़ाँ'
कभी मरना कभी जीना है मुहाल
महबूब ख़िज़ां
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हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते
जीने की शिकायत है तो मर क्यूँ नहीं जाते
महबूब ख़िज़ां
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हवा चली तो फिर आँखों में आ गए सब रंग
मगर वो सात बरस लौट कर नहीं आए
महबूब ख़िज़ां
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