है मुश्किल दौर सूखी रोटियाँ भी दूर हैं हम से
मज़े से तुम कभी काजू कभी किशमिश चबाते हो
महावीर उत्तरांचली
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काश होता मज़ा कहानी में
दिल मिरा बुझ गया जवानी में
महावीर उत्तरांचली
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सिर्फ़ नुक़सान होता है यारो
लाभ तकरार से नहीं होता
महावीर उत्तरांचली
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ये कड़वा सच है यारों मुफ़्लिसी का
यहाँ हर आँख में हैं टूटे सपने
महावीर उत्तरांचली
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अब याद कभी आए तो आईने से पूछो
'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँ नहीं जाते
महबूब ख़िज़ां
बात ये है कि आदमी शाइर
या तो होता है या नहीं होता
महबूब ख़िज़ां
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चाही थी दिल ने तुझ से वफ़ा कम बहुत ही कम
शायद इसी लिए है गिला कम बहुत ही कम
महबूब ख़िज़ां

