ला-वलद कहते हैं हम को ला-वलद
शेर से अज़-बस कि औलादी हैं हम
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
पूजता हूँ कभी बुत को कभी पढ़ता हूँ नमाज़
मेरा मज़हब कोई हिन्दू न मुसलमाँ समझा
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
रहम कर हम पर भी दिल-बर हैं तिरे
इश्क़ के हाथों से आवारों के बीच
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
रुख़्सार का दे शर्त नहीं बोसा-ए-लब से
जो जी में तिरे आए सो दे यार मगर दे
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
तुख़्म-ए-रैहाँ खिला तबीब मुझे
या'नी हूँ मैं मरीज़-ए-हज़रत-ए-ख़ाल
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
उम्र दो-चार रोज़ मेहमाँ है
ख़िदमत-ए-मेहमाँ करूँ न करूँ
मातम फ़ज़ल मोहम्मद

