तीर ओ तलवार से बढ़ कर है तिरी तिरछी निगह
सैकड़ों आशिक़ों का ख़ून किए बैठी है
मह लक़ा चंदा
उन को आँखें दिखा दे टुक साक़ी
चाहते हैं जो बार बार शराब
मह लक़ा चंदा
हर एक रात के पहलू से दिन निकलता है
वो लोग कैसे सँवर जाएँ जो तबाह नहीं
माह तलअत ज़ाहिदी
याद के ख़ुशनुमा जज़ीरों में
दिल की आवारगी सी रहती है
माह तलअत ज़ाहिदी
बादा-ए-ख़ुम-ए-ख़ाना-ए-तौहीद का मय-नोश हूँ
चूर हूँ मस्ती में ऐसा बे-ख़ुद-ओ-मदहोश हूँ
महाराज सर किशन परशाद शाद
दिल में जब से देखता है वो तिरी तस्वीर को
नूर बरसाता है अपनी चश्म-ए-तर से आफ़्ताब
महाराज सर किशन परशाद शाद
फ़ना ही का है बक़ा नाम दूसरा 'अंजुम'
नफ़स की आमद-ओ-शुद मौत का तराना है
महावीर परशाद अंजुम

