हिन्दू बचा ने छीन के दिल मुझ से यूँ कहा
हिन्दोस्ताँ भी किश्वर-ए-तुर्का से कम नहीं
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
इश्क़-ए-ख़ूबाँ नहीं है ऐसी शय
बाँध कर रखिए जिस को पुड़िया में
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
जाँ-ब-लब दम भर का हूँ मेहमान-ए-यार
एक बोसा मेरी मेहमानी करो
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
जहाँ से हूँ यहाँ आया वहाँ जाऊँगा आख़िर को
मिरा ये हाल है यारो न मुस्तक़बिल न माज़ी हूँ
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
ख़त देख कर मिरा मिरे क़ासिद से यूँ कहा
क्या गुल नहीं हुआ वो चराग़-ए-सहर हनूज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
कोई आज़ाद हो तो हो यारो
हम तो हैं इश्क़ के असीरों में
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
क्या कहूँ दिन को किस क़दर रोया
रात दिलबर को देख कर रोया मैं
मातम फ़ज़ल मोहम्मद

