ज़मानों बा'द मिले हैं तो कैसे मुँह फेरूँ
मिरे लिए तो पुरानी शराब हैं मिरे दोस्त
लियाक़त अली आसिम
ज़रा सा साथ दो ग़म के सफ़र में
ज़रा सा मुस्कुरा दो थक गया हूँ
लियाक़त अली आसिम
अब न वो ज़ौक़-ए-वफ़ा है न मिज़ाज-ए-ग़म है
हू-ब-हू गरचे कोई तेरी मिसाल आया था
लुत्फ़ुर्रहमान
जाते जाते दिया इस तरह दिलासा उस ने
बीच दरिया में कोई जैसे किनारा निकला
लुत्फ़ुर्रहमान
किस से उम्मीद करें कोई इलाज-ए-दिल की
चारागर भी तो बहुत दर्द का मारा निकला
लुत्फ़ुर्रहमान
मैं दर-ब-दर हूँ अभी अपनी जुस्तुजू में बहुत
मैं अपने लहजे को अंदाज़ दे रहा हूँ अभी
लुत्फ़ुर्रहमान
मैं ख़ुद ही अपने तआक़ुब में फिर रहा हूँ अभी
उठा के तू मेरी राहों से रास्ता ले जा
लुत्फ़ुर्रहमान

