अगर समझो नमाज़-ए-ज़ाहिद-ए-मग़रूर यारो
हज़ारों बार बेहतर-तर हमारी बे-नमाज़ी है
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
अपने भी इश्क़ को ज़वाल न हो
न तुम्हारे जमाल को है कमाल
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
छूटता है एक तो फँसते हैं आ कर इस में दो
आज-कल है गर्म-तर क्या ख़ूब बाज़ार-ए-क़फ़स
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
दरिया में वो धोया था कभी दस्त-ए-हिनाई
हसरत से वहीं पंजा-ए-मर्जां में लगी आग
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
देख कर हाथ में तस्बीह गले में ज़ुन्नार
मुझ से बेज़ार हुए काफ़िर ओ दीं-दार जुदा
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
देता है रोज़ रोज़ दिलासे नए नए
किस तरह ए'तिबार हो 'हाफ़िज़' के फ़ाल पर
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
हाथ का बाज़ू का गर्दन का कमर का किस के
हम को तावीज़ों में यही चार ही भाए ता'वीज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद

