मैं कि अपना ही पता पूछ रहा हूँ सब से
खो गई जाने कहाँ उम्र-ए-गुज़िश्ता मेरी
लुत्फ़ुर्रहमान
तमाम उम्र मिरा मुझ से इख़्तिलाफ़ रहा
गिला न कर जो कभी तेरा हम-नवा न हुआ
लुत्फ़ुर्रहमान
तिरा तो क्या कि ख़ुद अपना भी मैं कभी न रहा
मिरे ख़याल से ख़्वाबों का सिलसिला ले जा
लुत्फ़ुर्रहमान
मुझी से आई थी मिलने उदास चाँदनी रात
अगर ये जानता होता तो जागता भी मैं
एम.अार.क़ासमी
आज कल जो कसरत-ए-शोरीदगान-ए-इश्क़ है
रोज़ होते जाते हैं हद्दाद नौकर सैकड़ों
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
आज मस्जिद में नज़र आता तो है मय-कश मगर
मतलब उस का बेचना है शैख़ की दस्तार का
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
आतिश का शेर पढ़ता हूँ अक्सर ब-हस्ब-ए-हाल
दिल सैद है वो बहर-ए-सुख़न के नहंग का
मातम फ़ज़ल मोहम्मद

