ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे ख़ुशी से भर गया
एक दिन इतना हँसा वो हँसते हँसते मर गया
कृष्ण मोहन
अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख
दिल की दुनिया तो मगर सब से जुदा रख
कुमार पाशी
दश्त-ए-जुनूँ की ख़ाक उड़ाने वालों की हिम्मत देखो
टूट चुके हैं अंदर से लेकिन मन-मानी बाक़ी है
कुमार पाशी
हैं सारे इंकिशाफ़ अपने हैं सारे मुम्किनात अपने
हम इस दुनिया का सारा इल्म ले जाएँगे साथ अपने
कुमार पाशी
हुई हैं दैर ओ हरम में ये साज़िशें कैसी
धुआँ सा उठने लगा शहर के मकानों से
कुमार पाशी
कभी दिखा दे वो मंज़र जो मैं ने देखे नहीं
कभी तो नींद में ऐ ख़्वाब के फ़रिश्ते आ
कुमार पाशी
कोई तो ढूँड के मुझ को कहीं से ले आए
कि ख़ुद को देखा नहीं है बहुत ज़मानों से
कुमार पाशी

