इक आग सी अब लगी हुई है
पानी में असर कहाँ से आया
कृष्ण कुमार तूर
कब तक तू आसमाँ में छुप के बैठेगा
माँग रहा हूँ मैं कब से दुआ बाहर आ
कृष्ण कुमार तूर
ख़ुद ही चराग़ अब अपनी लौ से नालाँ है
नक़्श ये क्या उभरा ये कैसा ज़वाल हुआ
कृष्ण कुमार तूर
क्यूँ मुझे महसूस ये होता है अक्सर रात भर
सीना-ए-शब पर चमकता है समुंदर रात भर
कृष्ण कुमार तूर
मैं जब पेड़ से गिर के ज़मीं की ख़ाक हुआ
तब इक आलम-ए-मौहूम समझ में आया
कृष्ण कुमार तूर
मैं तो था मौजूद किताब के लफ़्ज़ों में
वो ही शायद मुझ को पढ़ना भूल गया
कृष्ण कुमार तूर
मैं वहम हूँ कि हक़ीक़त ये हाल देखने को
गिरफ़्त होता हूँ अपना विसाल देखने को
कृष्ण कुमार तूर

