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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

फिर मिरी याद आ रही होगी
फिर वो दीपक बुझा रही होगी

कुमार विश्वास




उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे
वो मिरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे

कुमार विश्वास




उस ने फेंका मुझ पे पत्थर और मैं पानी की तरह
और ऊँचा और ऊँचा और ऊँचा हो गया

कुंवर बेचैन




अपनी ख़्वाहिश में जो बस गए हैं वो दीवार-ओ-दर छोड़ दें
धूप आँखों में चुभने लगी है तो क्या हम सफ़र छोड़ दें

कुंवर एजाज़ राजा




ग़म-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से बे-नियाज़ाना निकलता है
बड़ी फ़र्ज़ानगी से तेरा दीवाना निकलता है

कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर




हर लम्हा माँगते हैं दुआ दीद-ए-यार की
याद-ए-बुताँ भी दिल में है याद-ए-ख़ुदा के साथ

कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर




इन शोख़ हसीनों की निराली है अदा भी
बुत हो के समझते हैं कि जैसे हैं ख़ुदा भी

कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर