दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई
बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई
जिगर मुरादाबादी
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धड़कने लगा दिल नज़र झुक गई
कभी उन से जब सामना हो गया
जिगर मुरादाबादी
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दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी काएनात गई
जिगर मुरादाबादी
दिल है क़दमों पर किसी के सर झुका हो या न हो
बंदगी तो अपनी फ़ितरत है ख़ुदा हो या न हो
जिगर मुरादाबादी
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दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
जिगर मुरादाबादी
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दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
दोनों हाथों से लूटती है हमें
कितनी ज़ालिम है तेरी अंगड़ाई
जिगर मुरादाबादी
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