आदत के ब'अद दर्द भी देने लगा मज़ा
हँस हँस के आह आह किए जा रहा हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
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आदमी के पास सब कुछ है मगर
एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं
जिगर मुरादाबादी
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आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है
जिगर मुरादाबादी
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रौशन
जिगर मुरादाबादी
आप के दुश्मन रहें वक़्फ़-ए-ख़लिश सर्फ़-ए-तपिश
आप क्यूँ ग़म-ख़्वारी-ए-बीमार-ए-हिज्राँ कीजिए
जिगर मुरादाबादी
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आतिश-ए-इश्क़ वो जहन्नम है
जिस में फ़िरदौस के नज़ारे हैं
जिगर मुरादाबादी
अब तो ये भी नहीं रहा एहसास
दर्द होता है या नहीं होता
जिगर मुरादाबादी
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