हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है
जिगर मुरादाबादी
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
जिगर मुरादाबादी
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया
जिगर मुरादाबादी
हमीं जब न होंगे तो क्या रंग-ए-महफ़िल
किसे देख कर आप शरमाइएगा
जिगर मुरादाबादी
हर तरफ़ छा गए पैग़ाम-ए-मोहब्बत बन कर
मुझ से अच्छी रही क़िस्मत मेरे अफ़्सानों की
जिगर मुरादाबादी
हसीं तेरी आँखें हसीं तेरे आँसू
यहीं डूब जाने को जी चाहता है
जिगर मुरादाबादी
हुस्न के हर जमाल में पिन्हाँ
मेरी रानाई-ए-ख़याल भी है
जिगर मुरादाबादी

