बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर
वो ज़िंदगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे
जिगर मुरादाबादी
बैठे हुए रक़ीब हैं दिलबर के आस-पास
काँटों का है हुजूम गुल-ए-तर के आस-पास
जिगर मुरादाबादी
बन जाऊँ न बेगाना-ए-आदाब-ए-मोहब्बत
इतना न क़रीब आओ मुनासिब तो यही है
जिगर मुरादाबादी
बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले
ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले
जिगर मुरादाबादी
भुलाना हमारा मुबारक मुबारक
मगर शर्त ये है न याद आईएगा
जिगर मुरादाबादी
बिगड़ा हुआ है रंग जहान-ए-ख़राब का
भर लूँ नज़र में हुस्न किसी के शबाब का
जिगर मुरादाबादी
चश्म पुर-नम ज़ुल्फ़ आशुफ़्ता निगाहें बे-क़रार
इस पशीमानी के सदक़े मैं पशीमाँ हो गया
जिगर मुरादाबादी

