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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पिघलते देख के सूरज की गर्मी
अभी मासूम किरनें रो गई हैं

जालिब नोमानी




और अब ये चाहता हूँ कोई ग़म बटाए मिरा
मैं अपनी मिट्टी कभी आप ढोने वाला था

जमाल एहसानी




दुनिया पसंद आने लगी दिल को अब बहुत
समझो कि अब ये बाग़ भी मुरझाने वाला है

जमाल एहसानी




हारने वालों ने इस रुख़ से भी सोचा होगा
सर कटाना है तो हथियार न डाले जाएँ

जमाल एहसानी




हम ऐसे बे-हुनरों में है जो सलीक़ा-ए-ज़ीस्त
तिरे दयार में पल-भर क़याम से आया

जमाल एहसानी




हज़ार तरह के थे रंज पिछले मौसम में
पर इतना था कि कोई साथ रोने वाला था

जमाल एहसानी




इक सफ़र में कोई दो बार नहीं लुट सकता
अब दोबारा तिरी चाहत नहीं की जा सकती

जमाल एहसानी