मुझ को मालूम है मेरी ख़ातिर
कहीं इक जाल बुना रक्खा है
जमाल एहसानी
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क़रार दिल को सदा जिस के नाम से आया
वो आया भी तो किसी और काम से आया
जमाल एहसानी
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क़रार जी को मरे जिस के नाम से आया
वो आया भी तो किसी और काम से आया
जमाल एहसानी
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सुब्ह आता हूँ यहाँ और शाम हो जाने के बा'द
लौट जाता हूँ मैं घर नाकाम हो जाने के बा'द
जमाल एहसानी
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सुनते हैं उस ने ढूँड लिया और कोई घर
अब तक जो आँख थी तिरे दर पर लगी हुई
जमाल एहसानी
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तमाम रात नहाया था शहर बारिश में
वो रंग उतर ही गए जो उतरने वाले थे
जमाल एहसानी
तिरे न आने से दिल भी नहीं दुखा शायद
वगरना क्या मैं सर-ए-शाम सोने वाला था
जमाल एहसानी
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