वक़्त की मौज हमें पार लगाती कैसे
हम ने ही जिस्म से बाँधे हुए पत्थर थे बहुत
जलील हैदर लाशारी
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वो दिल का टूटना तो कोई वाक़िआ न था
अब टूटे दिल की किर्चियों की धार से बचो
जलील हैदर लाशारी
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दीवारों की बस्ती में
दरवाज़ा लिक्खा मैं ने
जलील हश्मी
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सीख लिया जीना मैं ने
इतना ज़हर पिया मैं ने
जलील हश्मी
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तेरी सूरत पर गुमान-ए-दश्त-ओ-सहरा हाए हाए
तेरे क़दमों में बहारें ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी
जलील हश्मी
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लपका है ये इक उम्र का जाएगा न हरगिज़
इस गुल से तबीअत न भरेगी न भरी है
जलील क़िदवई
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ख़ुद अपने आप से लर्ज़ां रही उलझती रही
उठा न बार-ए-गराँ रात की जवानी से
जालिब नोमानी
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