दिल सा खिलौना हाथ आया है
खेलो तोड़ो जी बहलाओ
इब्न-ए-सफ़ी
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दिन के भूले को रात डसती है
शाम को वापसी नहीं होती
इब्न-ए-सफ़ी
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डूब जाने की लज़्ज़तें मत पूछ
कौन ऐसे में पार उतरा है
इब्न-ए-सफ़ी
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हुस्न बना जब बहती गंगा
इश्क़ हुआ काग़ज़ की नाव
इब्न-ए-सफ़ी
लिखने को लिख रहे हैं ग़ज़ब की कहानियाँ
लिक्खी न जा सकी मगर अपनी ही दास्ताँ
इब्न-ए-सफ़ी
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ज़मीन की कोख ही ज़ख़्मी नहीं अंधेरों से
है आसमाँ के भी सीने पे आफ़्ताब का ज़ख़्म
इब्न-ए-सफ़ी
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आँखों में ख़्वाब चुभन सोने नहीं देती है
एक मुद्दत से हमें तू ने जगा रक्खा है
इब्न-ए-उम्मीद
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