इक ज़रा सी बात पे ये मुँह बनाना रूठना
इस तरह तो कोई अपनों से ख़फ़ा होता नहीं
इब्न-ए-मुफ़्ती
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जिन पे नाज़ाँ थे ये ज़मीन ओ फ़लक
अब कहाँ हैं वो सूरतें बाक़ी
इब्न-ए-मुफ़्ती
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कैसा जादू है समझ आता नहीं
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के
इब्न-ए-मुफ़्ती
कर बुरा तो भला नहीं होता
कर भला तो बुरा नहीं होता
इब्न-ए-मुफ़्ती
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फिर से वो लौट कर नहीं आया
फिर दुआ में असर नहीं आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
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तेरे ख़्वाबों की लत लगी जब से
रात का इंतिज़ार रहता है
इब्न-ए-मुफ़्ती
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याद का क्या है आ गई फिर से
आँख का क्या है फिर से रो ली है
इब्न-ए-मुफ़्ती
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