ये कारोबार भी कब रास आया
ख़सारे में रहे हम प्यार कर के
इब्न-ए-मुफ़्ती
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यूँ तो पत्थर बहुत से देखे हैं
कोई तुम सा नज़र नहीं आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
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अजीब बात है कीचड़ में लहलहाए कँवल
फटे पुराने से जिस्मों पे सज के रेशम आए
इब्न-ए-सफ़ी
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बिल-आख़िर थक हार के यारो हम ने भी तस्लीम किया
अपनी ज़ात से इश्क़ है सच्चा बाक़ी सब अफ़्साने हैं
इब्न-ए-सफ़ी
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बुझ गया दिल तो ख़राबी हुई है
फिर किसी शोला-जबीं से मिलिए
इब्न-ए-सफ़ी
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चाँद का हुस्न भी ज़मीन से है
चाँद पर चाँदनी नहीं होती
इब्न-ए-सफ़ी
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देख कर मेरा दश्त-ए-तन्हाई
रंग-ए-रू-ए-बहार उतरा है
इब्न-ए-सफ़ी
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