ऐसे ख़ुद को अज़िय्यतें देना
तू ने 'फ़र्रुख़' कहाँ से सीखा है
इब्न-ए-उम्मीद
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हम यूँही ख़्वाब बुनते रहते हैं
खेल सारा क़ज़ा का होता है
इब्न-ए-उम्मीद
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मैं ख़ुशी में घिर के उदास हूँ
कोई और इस का सबब नहीं
इब्न-ए-उम्मीद
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आज ज़िंदाँ में उसे भी ले गए
जो कभी इक लफ़्ज़ तक बोला नहीं
इब्राहीम होश
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इन हज़ारों में और आप, ये क्या?
आप, जो एक थे हज़ारों में
इब्राहीम होश
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जो चुप लगाऊँ तो सहरा की ख़ामुशी जागे
जो मुस्कुराऊँ तो आज़ुर्दगी भी शरमाए
इब्राहीम होश
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करता हूँ एक ख़्वाब के मुबहम नुक़ूश याद
जब से खुली है आँख इसी मश्ग़ले में हूँ
इब्राहीम होश
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