वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए
कौन अब इश्क़ के बाज़ार में खोलेगा दुकाँ
इब्न-ए-इंशा
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वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो
इब्न-ए-इंशा
यूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया
बस्ती बस्ती काँटे देखे जंगल जंगल फूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
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अब तो कर डालिए वफ़ा उस को
वो जो वादा उधार रहता है
इब्न-ए-मुफ़्ती
दिल की बातों को दिल समझता है
दिल की बोली अजीब बोली है
इब्न-ए-मुफ़्ती
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दिल में सज्दे किया करो 'मुफ़्ती'
इस में पर्वरदिगार रहता है
इब्न-ए-मुफ़्ती
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हम से शायद मो'तबर ठहरी सबा
जिस ने ये गेसू सँवारे आप के
इब्न-ए-मुफ़्ती
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