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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं
इस बग़िया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो

इब्न-ए-इंशा




हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

इब्न-ए-इंशा




हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी
सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले

इब्न-ए-इंशा




हक़ अच्छा पर उस के लिए कोई और मिरे तो और अच्छा
तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पे चढ़ो ख़ामोश रहो

इब्न-ए-इंशा




हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता
हर किसी की नज़र नहीं होती

इब्न-ए-इंशा




इक साल गया इक साल नया है आने को
पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने को

इब्न-ए-इंशा




'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इब्न-ए-इंशा