हर तरफ़ इक मुहीब सन्नाटा
दिल धड़कता तो है मगर ख़ामोश
हिमायत अली शाएर
ईमाँ भी लाज रख न सका मेरे झूट की
अपने ख़ुदा पे कितना मुझे ए'तिमाद था
हिमायत अली शाएर
इस दश्त पे एहसाँ न कर ऐ अब्र-ए-रवाँ और
जब आग हो नम-ख़ुर्दा तो उठता है धुआँ और
हिमायत अली शाएर
इस दश्त-ए-सुख़न में कोई क्या फूल खिलाए
चमकी जो ज़रा धूप तो जलने लगे साए
हिमायत अली शाएर
इस जहाँ में तो अपना साया भी
रौशनी हो तो साथ चलता है
हिमायत अली शाएर
किस लिए कीजे किसी गुम-गश्ता जन्नत की तलाश
जब कि मिट्टी के खिलौनों से बहल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
मैं कुछ न कहूँ और ये चाहूँ कि मिरी बात
ख़ुश्बू की तरह उड़ के तिरे दिल में उतर जाए
हिमायत अली शाएर

