मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
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मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है
सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
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ना-कामी-ए-इश्क़ या कामयाबी
दोनों का हासिल ख़ाना-ख़राबी
हफ़ीज़ जालंधरी
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नासेह को बुलाओ मिरा ईमान सँभाले
फिर देख लिया उस ने उसी एक नज़र से
हफ़ीज़ जालंधरी
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नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल
तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा
हफ़ीज़ जालंधरी
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ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा
अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
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फिर दे के ख़ुशी हम उसे नाशाद करें क्यूँ
ग़म ही से तबीअत है अगर शाद किसी की
हफ़ीज़ जालंधरी

