क़ाएम किया है मैं ने अदम के वजूद को
दुनिया समझ रही है फ़ना हो गया हूँ मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
रंग बदला यार ने वो प्यार की बातें गईं
वो मुलाक़ातें गईं वो चाँदनी रातें गईं
हफ़ीज़ जालंधरी
सुनाता है क्या हैरत-अंगेज़ क़िस्से
हसीनों में खोई हो जिस ने जवानी
हफ़ीज़ जालंधरी
सुपुर्द-ए-ख़ाक ही करना था मुझ को
तो फिर काहे को नहलाया गया हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
तन्हाई-ए-फ़िराक़ में उम्मीद बार-हा
गुम हो गई सुकूत के हंगामा-ज़ार में
हफ़ीज़ जालंधरी
तसव्वुर में भी अब वो बे-नक़ाब आते नहीं मुझ तक
क़यामत आ चुकी है लोग कहते हैं शबाब आया
हफ़ीज़ जालंधरी
तौबा तौबा शैख़ जी तौबा का फिर किस को ख़याल
जब वो ख़ुद कह दे कि पी थोड़ी सी पी मेरे लिए
हफ़ीज़ जालंधरी

