फिर मेहरबाँ हुआ है 'ताबाँ' मिरा सितमगर
बातें तिरी किसी ने शायद सुनाइयाँ हैं
ताबाँ अब्दुल हई
मुझे आता है रोना ऐसी तन्हाई पे ऐ 'ताबाँ'
न यार अपना न दिल अपना न तन अपना न जाँ अपना
ताबाँ अब्दुल हई
न जा वाइज़ की बातों पर हमेशा मय को पी 'ताबाँ'
अबस डरता है तू दोज़ख़ से इक शरई दरक्का है
ताबाँ अब्दुल हई
न थे आशिक़ किसी बे-दाद पर हम जब तलक 'ताबाँ'
हमारे दिल के तईं कुछ दर्द-ओ-ग़म तब तक न था हरगिज़
ताबाँ अब्दुल हई
नेमत-ए-अल्वान भी ख़्वान-ए-फ़लक की देख ली
माह नान-ए-ख़ाम है और महर नान-ए-सोख़्ता
ताबाँ अब्दुल हई
रिंद वाइज़ से क्यूँ कि सरबर हो
उस की छू, की किताब और ही है
ताबाँ अब्दुल हई
सफ़र दुनिया से करना क्या है 'ताबाँ'
अदम हस्ती से राह-ए-यक-नफ़स है
ताबाँ अब्दुल हई
मुझ से बीमार है मिरा ज़ालिम
ये सितम किस तरह सहूँ 'ताबाँ'
ताबाँ अब्दुल हई
क़िस्मत में क्या है देखें जीते बचें कि मर जाएँ
क़ातिल से अब तो हम ने आँखें लड़ाइयाँ हैं
ताबाँ अब्दुल हई

