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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी
फिर भी फ़ानी दुनिया में जावेदाँ तो मैं भी हूँ जावेदाँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच




कैसा लम्हा आन पड़ा है
हँसता घर वीरान पड़ा है

बक़ा बलूच




लोग चले हैं सहराओं को
और नगर सुनसान पड़ा है

बक़ा बलूच




मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं
बहता रहता है तिरी याद का दरिया मुझ में

बक़ा बलूच




सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं
दर्द भी सूरत-ए-हालात बता देता है

बक़ा बलूच




तू ख़ुश है अपनी दुनिया में
मैं तिरी याद में जलता हूँ

बक़ा बलूच




ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही
आदमी से आदमी बरहम रहा

बक़ा बलूच