जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी
फिर भी फ़ानी दुनिया में जावेदाँ तो मैं भी हूँ जावेदाँ तो तुम भी हो
बक़ा बलूच
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कैसा लम्हा आन पड़ा है
हँसता घर वीरान पड़ा है
बक़ा बलूच
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लोग चले हैं सहराओं को
और नगर सुनसान पड़ा है
बक़ा बलूच
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मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं
बहता रहता है तिरी याद का दरिया मुझ में
बक़ा बलूच
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सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं
दर्द भी सूरत-ए-हालात बता देता है
बक़ा बलूच
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तू ख़ुश है अपनी दुनिया में
मैं तिरी याद में जलता हूँ
बक़ा बलूच
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ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही
आदमी से आदमी बरहम रहा
बक़ा बलूच
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