EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए

बलवान सिंह आज़र




तू भले मेरा ए'तिबार न कर
ज़िंदगी मैं तिरे कहे में हूँ

बलवान सिंह आज़र




दर्द उट्ठा था मिरे पहलू में
आख़िर-ए-कार जिगर तक पहुँचा

बक़ा बलूच




एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम
किस नगर की ख़ाक थे किस दश्त में ठहरे रहे

बक़ा बलूच




गर्मी-ए-शिद्दत-ए-जज़्बात बता देता है
दिल तो भूली हुई हर बात बता देता है

बक़ा बलूच




हम ने जिन को सच्चा जाना
निकलीं वो सब बातें झूटी

बक़ा बलूच




हर कूचे में अरमानों का ख़ून हुआ
शहर के जितने रस्ते हैं सब ख़ूनीं हैं

बक़ा बलूच