पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए
बलवान सिंह आज़र
तू भले मेरा ए'तिबार न कर
ज़िंदगी मैं तिरे कहे में हूँ
बलवान सिंह आज़र
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दर्द उट्ठा था मिरे पहलू में
आख़िर-ए-कार जिगर तक पहुँचा
बक़ा बलूच
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एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम
किस नगर की ख़ाक थे किस दश्त में ठहरे रहे
बक़ा बलूच
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गर्मी-ए-शिद्दत-ए-जज़्बात बता देता है
दिल तो भूली हुई हर बात बता देता है
बक़ा बलूच
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हम ने जिन को सच्चा जाना
निकलीं वो सब बातें झूटी
बक़ा बलूच
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हर कूचे में अरमानों का ख़ून हुआ
शहर के जितने रस्ते हैं सब ख़ूनीं हैं
बक़ा बलूच
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