इस तरह कुछ बदल गई है ज़मीं
हम को अब ख़ौफ़-ए-आसमाँ न रहा
बाक़र मेहदी
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जाने किन मुश्किलों से जीते हैं
क्या करें कोई मेहरबाँ न रहा
बाक़र मेहदी
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जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं
ख़ुश वो क्या होंगे जब ख़फ़ा ही नहीं
बाक़र मेहदी
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काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए
इस नए दौर में हम फिर से मुसलमाँ होंगे
बाक़र मेहदी
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कभी तो भूल गए पी के नाम तक उन का
कभी वो याद जो आए तो फिर पिया न गया
बाक़र मेहदी
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मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं
इक मेरी ज़िंदगी के तुम्हीं राज़-दाँ नहीं
बाक़र मेहदी
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मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है
मैं तन्हा आदमी की दोस्ती हूँ
बाक़र मेहदी

