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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हार जाएगी यक़ीनन तीरगी
गर मुसलसल रौशनी ज़िंदा रही

बलवान सिंह आज़र




हवा के दोश पर लगता है उड़ने
जो पत्ता टूट जाता है शजर से

बलवान सिंह आज़र




ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र
कोई थक-हार गया है मुझ में

बलवान सिंह आज़र




खुला मकान है हर एक ज़िंदगी 'आज़र'
हवा के साथ दरीचों से ख़्वाब आते हैं

बलवान सिंह आज़र




कोई मंज़िल कभी नहीं आई
रास्ते में था रास्ते में हूँ

बलवान सिंह आज़र




मार देती है ज़िंदगी ठोकर
ज़ेहन जब उल्टे पाँव चलता है

बलवान सिंह आज़र




पावँ से काँटा निकल जाए अगर
अपनी रफ़्तार बढ़ा लूँ मैं भी

बलवान सिंह आज़र