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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कशिश तुझ सी न थी तेरे ग़मों में
लब-ओ-लहजा मगर हाँ हू-ब-हू था

बकुल देव




ख़्वाब नद्दी सा गुज़र जाएगा
दश्त आँखों में ठहर जाना है

बकुल देव




मैं सारे फ़ासले तय कर चुका हूँ
ख़ुदी जो दरमियाँ थी दरमियाँ है

बकुल देव




मिले अब के तो रोए टूट कर हम
गुनाह अपनी सज़ा के रू-ब-रू था

बकुल देव




मुस्कुराने का फ़न तो बअ'द का है
पहले साअ'त का इंतिख़ाब करो

बकुल देव




सम्त दुनिया के हम गए ही नहीं
उस इलाक़े से दुश्मनी सी रही

बकुल देव




समुंदर है कोई आँखों में शायद
किनारों पर चमकते हैं गुहर से

बकुल देव