कशिश तुझ सी न थी तेरे ग़मों में
लब-ओ-लहजा मगर हाँ हू-ब-हू था
बकुल देव
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ख़्वाब नद्दी सा गुज़र जाएगा
दश्त आँखों में ठहर जाना है
बकुल देव
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मैं सारे फ़ासले तय कर चुका हूँ
ख़ुदी जो दरमियाँ थी दरमियाँ है
बकुल देव
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मिले अब के तो रोए टूट कर हम
गुनाह अपनी सज़ा के रू-ब-रू था
बकुल देव
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मुस्कुराने का फ़न तो बअ'द का है
पहले साअ'त का इंतिख़ाब करो
बकुल देव
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सम्त दुनिया के हम गए ही नहीं
उस इलाक़े से दुश्मनी सी रही
बकुल देव
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समुंदर है कोई आँखों में शायद
किनारों पर चमकते हैं गुहर से
बकुल देव
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