न जाने कौन अपाहिज बना रहा है हमें
सफ़र में तर्क-ए-सफ़र का ख़याल क्यूँ आया
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
रात इक शख़्स बहुत याद आया
जिस घड़ी चाँद नुमूदार हुआ
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
'शफ़क़' का रंग कितने वालेहाना-पन से बिखरा है
ज़मीं ओ आसमाँ ने मिल के उनवान-ए-सहर लिक्खा
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
अपने लिए ही मुश्किल है
इज़्ज़त से जी पाना भी
अज़ीज़ अन्सारी
हमारी मुफ़्लिसी आवारगी पे तुम को हैरत क्यूँ
हमारे पास जो कुछ है वो सौग़ातें तुम्हारी हैं
अज़ीज़ अन्सारी
ये अपनी बेबसी है या कि अपनी बे-हिसी यारो
है अपना हाथ उन के सामने जो ख़ुद भिकारी हैं
अज़ीज़ अन्सारी
आईना-ख़ाने में खींचे लिए जाता है मुझे
कौन मेरी ही अदालत में बुलाता है मुझे
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

