ख़याल आता है अक्सर उतार फेंकूँ बदन
कि ये लिबास मिरी ख़ाक से ज़ियादा है
अज़ीम हैदर सय्यद
किस लिए ख़ुद को समझता है वो पत्थर की लकीर
उस का इंकार भी इक़रार में आ सकता है
अज़ीम हैदर सय्यद
लिबास देख के इतना हमें ग़रीब न जान
हमारा ग़म तिरी इम्लाक से ज़ियादा है
अज़ीम हैदर सय्यद
सर पे सूरज है तो फिर छाँव से महज़ूज़ न हो
धूप का रंग भी दीवार में आ सकता है
अज़ीम हैदर सय्यद
नशा टूटा नहीं है मार खा कर
कि हम ने पी है कम खाई बहुत है
अज़ीज़ अहमद
अंधेरा इतना है अब शहर के मुहाफ़िज़ को
हर एक रात कोई घर जलाना पड़ता है
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
बहुत दिनों से इधर उस को याद भी न किया
बहुत दिनों से उधर का ख़याल क्यूँ आया
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

