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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

चराग़ों ने हमारे साए लम्बे कर दिए इतने
सवेरे तक कहीं पहुँचेंगे अब अपने बराबर हम

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




धूप मेरी सारी रंगीनी उड़ा ले जाएगी
शाम तक मैं दास्ताँ से वाक़िआ हो जाऊँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स
ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से
किसी ने लिख दिया है ताक़-ए-निस्याँ पर पता अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




गए मौसम में मैं ने क्यूँ न काटी फ़स्ल ख़्वाबों की
मैं अब जागी हूँ जब फल खो चुके हैं ज़ाइक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे
तो बढ़ के ज़िंदगी ने पेश कीं बैसाखियाँ हम को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा




हम हैं एहसास के सैलाब-ज़दा साहिल पर
देखिए हम को कहाँ ले के किनारा जाए

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा